डबल झटका : प्रीमियम पेट्रोल 2 रुपये प्रति लीटर और इंडस्ट्रियल डीजल 22 रुपये महंगा

नई दिल्ली: मिडिल ईस्ट के तनाव और ग्लोबल मार्केट में मची हलचल का असर अब भारतीय पेट्रोल पंपों पर दिखने लगा है। कंपनियों ने कार या बाइक में हाई-परफॉर्मेंस वाला पेट्रोल और पावर पेट्रोल की कीमतों में इजाफा कर दिया है, जिससे लग्जरी गाड़ियां चलाने वालों की जेब पर बोझ बढ़ेगा।

देश की बड़ी तेल कंपनियों जैसे HPCL ने अपने प्रीमियम पेट्रोल जिसे ‘Power’ या ‘XP95’ भी कहा जाता है, की कीमतों में 2 रुपये प्रति लीटर तक की बढ़ोतरी कर दी है। पावर पेट्रोल और एक्सपी95 जैसे ब्रांडेड फ्यूल की कीमत लगभग 111.68 रुपए प्रति लीटर से बढ़कर लगभग 113.77 रुपये प्रति लीटर हो गई है। IndianOil समेत तेल कंपनियों ने 95-ऑक्टेन प्रीमियम पेट्रोल (XP-95) की कीमत करीब 2 प्रति लीटर बढ़ाई है, जबकि इंडस्ट्रियल डीजल के दाम में 22 रुपये प्रति लीटर तक की बड़ी बढ़ोतरी की गई है।

रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाला सामान्य पेट्रोल और डीजल अभी भी पुराने रेट पर ही मिल रहा है। कंपनी ने साफ संकेत दिया है कि वह जिम्मेदारी से कीमत तय करने की नीति अपना रही है, ताकि आम आदमी पर अचानक बोझ न पड़े। यह बढ़ोतरी सीधे आम जनता को ज्यादा प्रभावित नहीं करेगी, क्योंकि प्रीमियम पेट्रोल का इस्तेमाल देश में बहुत कम लोग सिर्फ 2 से 5 प्रतिशत तक करते हैं। फैसले का ज्यादा असर हाई-एंड गाड़ियों और खास यूजर्स पर ही पड़ेगा। लेकिन, असली झटका इंडस्ट्रियल सेक्टर को लगा है, जहां डीजल ₹22 प्रति लीटर तक महंगा कर दिया गया है। इसका असर आगे चलकर ट्रांसपोर्ट, मैन्युफैक्चरिंग और सामान की कीमतों पर भी दिख सकता है।

दरअसल अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में जोरदार उछाल आया है। खाड़ी क्षेत्र में तनाव के बाद तेल की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं, जिससे भारत जैसे देशों के लिए आयात महंगा हो गया है। भारत अपनी जरूरत का करीब 90% कच्चा तेल बाहर से मंगाता है, इसलिए ग्लोबल कीमतों का सीधा असर यहां पड़ता है। दिल्ली में सामान्य पेट्रोल ₹94.77 और डीजल ₹87.67 प्रति लीटर पर ही स्थिर है, जिससे आम उपभोक्ताओं को राहत मिली हुई है। लेकिन अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में यही हाल रहा, तो आने वाले समय में आम पेट्रोल-डीजल भी महंगे हो सकते हैं। कुल मिलाकर, अभी तो सरकार और तेल कंपनियों ने आम आदमी को राहत देने की कोशिश की है, लेकिन ग्लोबल मार्केट का दबाव बना रहा तो यह राहत ज्यादा समय तक टिकेगी या नहीं, यह देखना होगा।

1 अप्रैल 2026 से देशभर के पंपों पर पेट्रोल में 20% एथेनॉल जरूरी

नई दिल्ली: अब तक पेट्रोल में कम मात्रा में एथेनॉल (जैसे 10%) मिलाया जाता था, लेकिन अब सरकार ने तय किया है कि 1 अप्रैल 2026 से पूरे देश में पेट्रोल में 20% तक एथेनॉल मिलाना जरूरी होगा। इस तरह के पेट्रोल को E20 कहा जाता है। उसकी क्वालिटी भी बेहतर रखी जाएगी। उसमें कम से कम 95 RON होना जरूरी होगा, ताकि इंजन को कोई नुकसान न हो।

इंडिया बहुत सारा कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। जब पेट्रोल में एथेनॉल (जो भारत में गन्ने, मक्का और अनाज से बनता है) मिलाया जाएगा, तो विदेशों से तेल कम मंगाना पड़ेगा। इससे देश का पैसा बचेगा। एथेनॉल पेट्रोल की तुलना में ज्यादा साफ जलता है। इससे गाड़ियों से निकलने वाला धुआं और प्रदूषण कम होगा। एथेनॉल बनाने के लिए गन्ना, मक्का और दूसरे कृषि उत्पादों की जरूरत होती है। जब इनकी मांग बढ़ेगी, तो किसानों को सीधा फायदा मिलेगा और उनकी आय बढ़ेगी।

यह पेट्रोल भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) द्वारा तय गुणवत्ता मानकों के अनुसार ही तैयार किया जाएगा। इस E20 पेट्रोल का कम से कम 95 RON होगा। अगर किसी खास इलाके में तकनीकी दिक्कत हो, सप्लाई की समस्या हो या कोई विशेष परिस्थिति हो, तो सरकार उस क्षेत्र को कुछ समय के लिए राहत (छूट) दे सकती है। वहां अस्थायी रूप से यह नियम पूरी तरह लागू नहीं होगा।

सभी तेल कंपनियों को 20% एथेनॉल वाला उच्च गुणवत्ता का पेट्रोल बेचना होगा। एथेनॉल गन्ना, मक्का और अन्य अनाज से बनने वाला घरेलू और नवीकरणीय ईंधन है। यह सामान्य पेट्रोल की तुलना में ज्यादा साफ जलता है। सरकार का लक्ष्य है कि पेट्रोल में एथेनॉल मिलाकर विदेशी तेल पर निर्भरता कम की जाए और देश का विदेशी मुद्रा खर्च घटाया जाए। तेल मंत्रालय के मुताबिक 2014-15 से अब तक एथेनॉल मिश्रण की वजह से भारत को 1.40 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की विदेशी मुद्रा बचत हुई है।

उद्योग विशेषज्ञों का कहना है कि 2023 से 2025 के बीच बने ज्यादातर नए वाहन E20 ईंधन के अनुकूल हैं और उन्हें बड़ी परेशानी नहीं होगी। RON यानी Research Octane Number ईंधन की गुणवत्ता मापने का पैमाना है। यह बताता है कि ईंधन इंजन में ‘नॉकिंग’ यानी अनियमित जलने से कितना बचाता है। अगर ईंधन सही तरीके से न जले तो इंजन से आवाज आती है, परफॉर्मेंस घटती है और लंबे समय में नुकसान हो सकता है।

2025 में फ्यूल की जंग में फिसला पेट्रोल, CNG की रफ्तार ने बदला खेल

नई दिल्ली: इंडिया के ऑटो मार्केट में 2025 एक बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। सालों से भारतीय सड़कों पर राज करने वाली पेट्रोल कारों की बादशाहत पहली बार हिली। अब लोग कार ही नहीं खरीद रहे हैं, हिसाब लगाकर फैसला कर रहे हैं। बढ़ती ईंधन कीमतें, रनिंग कॉस्ट का दबाव और माइलेज की हकीकत ने ग्राहकों को पेट्रोल से आगे सोचने पर मजबूर कर दिया है। पेट्रोल कारें पीछे हटीं, वहीं CNG सस्ती दौड़ का भरोसा बनी, इलेक्ट्रिक ने भविष्य की झलक दिखाई, डीज़ल ने SUV के दम पर खुद को जिंदा रखा और हाइब्रिड ने बैलेंस का रास्ता चुना।

2025 में देश में कुल पैसेंजर व्हीकल्स की बिक्री करीब 45.8 लाख यूनिट तक पहुंच गई, जो पिछले साल से लगभग 6 फीसदी ज्यादा है। इसी ग्रोथ के बीच पेट्रोल कारों की हिस्सेदारी 59.4% से फिसलकर 53.3% पर आ गई। साल भर में करीब 1.3 लाख कम पेट्रोल कारें बिकीं।

अब कार दिल से नहीं, दिमाग और जेब से खरीदी जा रही है। पेट्रोल की बढ़ती कीमतें और E20 के साथ माइलेज की जमीनी सच्चाई ने आम खरीदार को हर किलोमीटर का हिसाब लगाने पर मजबूर कर दिया। पहले जहां पेट्रोल “सेफ चॉइस” माना जाता था, वहीं अब वही सवालों के घेरे में आ गया है। इसी खाली जगह में CNG ने एंट्री नहीं ली, बल्कि पूरी बाज़ी पलट दी। कम रनिंग कॉस्ट, स्थिर ईंधन कीमतें और फैक्ट्री-फिटेड टेक्नोलॉजी ने इसे झिझक से निकालकर भरोसे की ड्राइवर सीट पर बैठा दिया। Maruti Suzuki और Tata की CNG कारों ने शहरों में यह साबित कर दिया कि अब CNG सिर्फ सस्ता विकल्प नहीं, बल्कि समझदार और भविष्य की सोच वाला फैसला है। जिन डीज़ल कारों को खत्म माना जा रहा था, उन्होंने भी चुपचाप वापसी की। SUV सेगमेंट ने डीज़ल को जिंदा रखा और इसकी हिस्सेदारी बढ़कर 18.3% हो गई।

इलेक्ट्रिक कारों की हिस्सेदारी करीब दोगुनी होकर 4.6% पहुंच गई। बेहतर रेंज और नए मॉडल्स ने EV को भरोसेमंद बनाया। Toyota Innova Hycross और Maruti Grand Vitara जैसे मॉडल्स के दम पर हाइब्रिड की हिस्सेदारी 2.6% तक पहुंची। 2025 वह साल बन गया जब इंडियन कार खरीदारों को समझ में आ गया कि पेट्रोल ही आखिरी विकल्प नहीं है। इस साल कम खर्च, बेहतर माइलेज और भविष्य की सोच ने कार बाजार की दिशा ही बदल दी।

दिल्ली में पेट्रोल और CNG वाहन हो सकते हैं महंगे, सरकार बढ़ा सकती है ग्रीन सेस

नई दिल्ली: दिल्ली में आने वाले समय में पेट्रोल और CNG वाहन महंगे हो सकते हैं। दिल्ली सरकार चाहती है कि लोग पेट्रोल और CNG वाहनों की जगह इलेक्ट्रिक वाहन (EV) खरीदें, ताकि शहर की आबो-हवा साफ-सुथरी हो। इसलिए सरकार अब सोच रही है कि जो ग्रीन सेस पहले सिर्फ डीज़ल कारों पर लगता था, उसे अब सभी पेट्रोल और CNG वाहनों पर भी लगाया जाए।

ड्राफ्ट इलेक्ट्रिक वाहन नीति के अनुसार नए पेट्रोल और CNG वाहन खरीदने पर 1–2 प्रतिशत अतिरिक्त टैक्स (लेवी) लग सकता है। पहले से टैक्स वाली डीज़ल कारों पर यह 2 प्रतिशत तक बढ़ाया जा सकता है। अगर यह लागू हुआ तो पारंपरिक वाहनों की ऑन-रोड कीमतें बढ़ जाएंगी, जिससे EV और ICE वाहनों के बीच की कीमत का अंतर कम होगा। यह नीति मार्च 2026 तक कैबिनेट की मंजूरी के बाद लागू हो। दिल्ली में ग्रीन सेस पहली बार अपनी EV पॉलिसी 2020 के तहत शुरू किया था, जो अगस्त 2023 में खत्म हो गया था, लेकिन इसे अब मार्च 2026 तक बढ़ा दिया गया है।

दिल्ली में फिलहाल इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) का हिस्सा लगभग 12–14% है। इस साल अब तक दिल्ली में कुल 8 लाख वाहन पंजीकृत हुए हैं, जिनमें से 1.11 लाख इलेक्ट्रिक वाहन हैं। सरकार चाहती है कि यह हिस्सा और बढ़े। इसके लिए सरकार नई EV खरीदने वालों को इंसेंटिव देगी, ताकि उन्हें EV लेना फायदेमंद लगे। पारंपरिक पेट्रोल, डीज़ल और CNG वाहनों पर अतिरिक्त लागत या टैक्स लगाकर लोग EV की तरफ आकर्षित हों। ड्राफ्ट नीति के अनुसार EV लोन पर ब्याज दर कम हो सकती है ताकि कर्ज सस्ता हो। पुराने वाहनों को स्क्रैप करके बदलने पर इंसेंटिव मिल सकता है। चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और बैटरी स्वैपिंग के लिए वित्तीय मदद मिल सकती है। 10 साल से पुराने वाहनों पर अलग से टैक्स लगाया जा सकता है।

सरकार का अनुमान है कि पुराने वाहनों पर नया सेस लगने से सालाना करीब ₹300 करोड़ की कमाई हो सकती है। इंडस्ट्री विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ मामूली सेस बढ़ाने से EV अपनाने पर ज्यादा असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि EV की उच्च शुरुआती कीमतें अब भी सबसे बड़ी बाधा हैं। सरकार ने EV अपनाने को बढ़ावा देने की दिशा में योजना बनाई है, लेकिन असली बदलाव के लिए सिर्फ सेस बढ़ाना काफी नहीं है।