इंडिया में EV बूम से इलेक्ट्रिक क्रांति, पर चार्जिंग सिस्टम का कड़ा इम्तिहान

नई दिल्ली: इंडिया में इलेक्ट्रिक वाहनों की रफ्तार अब तेज़ी से बढ़ रही है। इस EV क्रांति के बीच चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी की एक बड़ी चुनौती सामने आ रही है। यही असंतुलन अब पूरे सिस्टम की सबसे बड़ा इम्तिहान बनता जा रहा है। 2025 में भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री 23 लाख यूनिट्स को पार कर गई। देश की सड़कों पर कुल EV की संख्या करीब 59 लाख (5.9 मिलियन) तक पहुंच गई है, लेकिन अब तक देशभर में सिर्फ करीब 26,000 पब्लिक चार्जिंग स्टेशन ही मौजूद हैं।

Tata Motors की इलेक्ट्रिक शाखा के अधिकारियों के अनुसार डेटा और कंपनियों के बीच सहयोग से यह तय किया जा रहा है कि चार्जिंग स्टेशन कहां सबसे ज्यादा जरूरी हैं। इसी रणनीति के तहत अब हाइवे कॉरिडोर पर तेजी से चार्जर लगाए जा रहे हैं, जिससे लंबी दूरी की EV यात्रा, जो पहले मुश्किल मानी जाती थी, अब धीरे-धीरे आसान होती जा रही है। आंकड़े बताते हैं कि टाटा मोटर्स की EV देश के 95% रोड नेटवर्क को कवर कर चुके हैं। करीब आधे ग्राहक 500 किलोमीटर से ज्यादा की यात्रा भी कर रहे हैं, जिससे बैटरी खत्म होने का डर कम हो रहा है।

अब सिर्फ चार्जर होना काफी नहीं है, बल्कि उनका तेज़ और भरोसेमंद होना भी उतना ही जरूरी है, अभी भारत में ज्यादातर चार्जिंग स्टेशन 25–30 किलोवाट की क्षमता पर काम करते हैं, जबकि नई EV कारें 60 किलोवाट या उससे ज्यादा की क्षमता सपोर्ट करती हैं।
अब “मल्टी-बे चार्जिंग हब” बनाए जा रहे हैं, जहां एक साथ कई गाड़ियां चार्ज हो सकें, वहीं Tata Power जैसी कंपनियां अब सिर्फ चार्जर लगाने पर नहीं, बल्कि उनके उपयोग पर भी ध्यान दे रही हैं, क्योंकि देशभर में औसतन चार्जर्स का उपयोग सिर्फ 4–5% ही हो पा रहा है।

Tata Power ने अब तक 630 से ज्यादा शहरों में 5,600 से अधिक पब्लिक और कैप्टिव चार्जिंग पॉइंट लगाए हैं। 2 लाख से ज्यादा होम चार्जर भी इंस्टॉल किए हैं। हाइवे पर 180 किलोवॉट जैसे हाई-स्पीड चार्जर लगाए जा रहे हैं, जो सिर्फ 15–30 मिनट में बैटरी को 20% से 80% तक चार्ज कर सकते हैं। लागत भी एक बड़ी समस्या है। एक 60 किलोवॉट DC फास्ट चार्जर की कीमत 8 लाख रुपये से ज्यादा होती है, जबकि पूरी सेटअप कॉस्ट 5 से 15 लाख रुपये और जोड़ देती है। बड़े चार्जिंग हब की लागत तो करोड़ों में पहुंच जाती है।