EV बैटरी निर्माण में आत्मनिर्भरता की ओर INDIA के बढ़ते मज़बूत कदम

नई दिल्ली : इंडिया अब सिर्फ इलेक्ट्रिक वाहन बनाने तक सीमित नहीं रहना चाहता बल्कि उनकी बैटरियों के लिए जरूरी कच्चे माल और कंपोनेंट्स के निर्माण में भी आत्मनिर्भर बनने की दिशा में बड़ा कदम उठाने जा रहा है। केंद्र सरकार इलेक्ट्रिक वाहनों में इस्तेमाल होने वाली आधुनिक लिथियम-आयन बैटरियों के लिए जरूरी कैथोड और एनोड जैसे अहम कंपोनेंट्स के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए नई टैक्स छूट देने पर विचार कर रही है। सरकार का लक्ष्य आयात पर निर्भरता कम करना और विदेशी मुद्रा की बचत करना है।

सूत्रों के अनुसार भारी उद्योग मंत्रालय आधुनिक बैटरियों के निर्माण में इस्तेमाल होने वाले कैथोड और एनोड जैसे महत्वपूर्ण कंपोनेंट्स के स्थानीय उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए नई योजना तैयार कर रहा है। घरेलू उद्योगों ने सरकार से मांग की है कि इन क्षेत्रों में निवेश और उत्पादन को प्रोत्साहित करने के लिए विशेष सहायता दी जाए। बताया जा रहा है कि अगले तीन महीनों के भीतर इस संबंध में प्रस्ताव तैयार कर मंजूरी के लिए भेजा जा सकता है।

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और बढ़ते विदेशी मुद्रा व्यय को कम करने की आवश्यकता पर जोर दिया था। भारी उद्योग मंत्रालय पहले से ही 18,100 करोड़ रुपये की Advanced Chemistry Cell (ACC) बैटरी मैन्युफैक्चरिंग प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) योजना चला रहा है। इस योजना का उद्देश्य देश में 50 गीगावाट घंटे (GWh) एडवांस्ड केमिस्ट्री सेल बैटरी निर्माण क्षमता विकसित करना है।

उद्योग जगत के अनुमान के अनुसार वर्ष 2030 तक भारत को 2 लाख टन से अधिक एनोड एक्टिव मैटेरियल (AAM) और 4 लाख टन से अधिक कैथोड एक्टिव मैटेरियल (CAM) की जरूरत होगी। इससे अगले पांच वर्षों में निजी क्षेत्र द्वारा घोषित लगभग 223 GWh बैटरी निर्माण क्षमता की मांग पूरी की जा सकेगी। विशेषज्ञों का कहना है कि लिथियम-आयन बैटरी की कुल सामग्री लागत का करीब 70 प्रतिशत हिस्सा कैथोड और एनोड पर खर्च होता है, जबकि वर्तमान में भारत इन प्रमुख कंपोनेंट्स के लिए लगभग पूरी तरह आयात पर निर्भर है।

उद्योग प्रतिनिधियों के अनुसार तैयार उत्पादों पर अपेक्षाकृत कम आयात शुल्क लगता है, जबकि घरेलू उत्पादन के लिए जरूरी कच्चे माल पर अधिक शुल्क देना पड़ता है। इससे भारतीय निर्माताओं की लागत बढ़ती है और अप्रयुक्त इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) का बोझ भी बढ़ जाता है।