नई दिल्ली: इंडियन कमर्शियल EV सेक्टर में बड़ा दांव लगाने की तैयारी में दिख रहा है। सरकार निजी ऑपरेटरों को इलेक्ट्रिक बस और ट्रक अपनाने के लिए 1 अरब डॉलर (करीब ₹8,000–8,500 करोड़) से ज्यादा के इंसेंटिव पैकेज पर विचार कर रही है। यह योजना करीब 10 साल तक चल सकती है और इसका सबसे बड़ा फोकस प्राइवेट बस ऑपरेटरों पर रहने की संभावना है।
इंडिया डीजल पर निर्भरता कम करना चाहता है। वेस्ट एशिया संकट और तेल सप्लाई से जुड़े जोखिमों के बाद सरकार ऊर्जा सुरक्षा को लेकर ज्यादा सतर्क हुई है। भारत अपनी जरूरत का करीब 90% कच्चा तेल आयात करता है। इंटरसिटी बस ऑपरेटर, प्राइवेट ट्रांसपोर्ट कंपनियां और ट्रक फ्लीट मालिक इस योजना के सबसे बड़े लाभार्थी हो सकते हैं। इलेक्ट्रिक बसों और ट्रक की शुरुआती कीमत काफी ज्यादा होती है। इसलिए सरकार प्रति वाहन 15 लाख तक ब्याज सब्सिडी (Interest Subvention) देने पर विचार कर रही है। साथ ही बैंक आसानी से लोन दें, इसके लिए क्रेडिट गारंटी सिस्टम भी लाया जा सकता है।
शुरुआती चरण में करीब 10,000 इलेक्ट्रिक बसों को सपोर्ट देने की चर्चा है। बाद में इसे बढ़ाकर 40–50 हजार वाहनों तक ले जाया जा सकता है। इंडस्ट्री ने सरकार से चार्जिंग पार्क, टोल छूट, टैक्स राहत और सस्ती बिजली दरें देने की मांग भी रखी है। भारत में बसों की संख्या 20 लाख से ज्यादा है, लेकिन सरकार के पास सिर्फ करीब 5% फ्लीट है। बाकी हिस्सा निजी ऑपरेटरों के पास है। वहीं ट्रक सेक्टर लगभग पूरी तरह प्राइवेट हाथों में है और डीजल की सबसे ज्यादा खपत भी यही करता है।
अगर यह योजना लागू होती है तो भारत में इलेक्ट्रिक बसों और ट्रकों की बिक्री तेज हो सकती है। इससे डीजल खर्च घटेगा। शहरों में प्रदूषण कम होगा। EV इन्फ्रास्ट्रक्चर को भी बड़ा बूस्ट मिल सकता है।
