नई दिल्ली। इंडिया ने स्वच्छ परिवहन की दिशा में दुनिया से बिल्कुल अलग रास्ता चुना है। जहां चीन और यूरोप इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) को बढ़ावा देकर पारंपरिक पेट्रोल इंजन को धीरे-धीरे खत्म करने की दिशा में बढ़ रहे हैं, वहीं भारत इलेक्ट्रिक वाहनों और एथेनॉल से चलने वाले फ्लेक्स-फ्यूल (Flex Fuel) इंजन को साथ लेकर आगे बढ़ने की रणनीति पर काम कर रहा है। सरकार ने E20 पेट्रोल के बाद अब E85 फ्यूल की शुरुआत कर दी है, जिसमें 80 से 85 प्रतिशत एथेनॉल होता है। फिलहाल इसकी बिक्री 48 पेट्रोल पंपों पर शुरू हो चुकी है। लक्ष्य है कि 2026 के अंत तक 500 और 2027 तक करीब 5,000 फ्यूल स्टेशन पर E85 उपलब्ध कराया जाए।
सरकार का मानना है कि इससे एक साथ कई फायदे होंगे। देश का कच्चे तेल पर आयात कम होगा। वाहनों से निकलने वाला प्रदूषण घटेगा। गन्ना उत्पादक किसानों की आय बढ़ेगी। मौजूदा पेट्रोल इंजन तकनीक का भी बेहतर उपयोग हो सकेगा। E20 पेट्रोल पूरे देश में लागू होने के बाद अब सरकार E85 और E100 जैसे उच्च एथेनॉल मिश्रण वाले ईंधनों को भी वाहन ईंधन नियमों में शामिल करने की तैयारी कर रही है। इससे फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों का रास्ता और आसान होगा।
हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि इस बदलाव को धीरे-धीरे लागू करना होगा। उनका मानना है कि शुरुआत उन राज्यों से होनी चाहिए जहां एथेनॉल का उत्पादन ज्यादा होता है, जैसे महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक। इन राज्यों में एथेनॉल की उपलब्धता बेहतर है और वहां इस तकनीक को अपनाना ज्यादा आसान होगा।
ऑटोमोबाइल कंपनियों का भी कहना है कि तकनीक तैयार है, लेकिन सबसे बड़ी चुनौती ग्राहकों का भरोसा जीतना है। लोगों के मन में अभी भी सवाल हैं कि क्या हर जगह E85 मिलेगा, माइलेज कितना होगा और खर्च कितना आएगा? जब तक इन सवालों का जवाब नहीं मिलेगा, तब तक बड़े पैमाने पर इसकी स्वीकार्यता आसान नहीं होगी। विशेषज्ञों के मुताबिक भारत का यह मॉडल दुनिया के दूसरे बड़े बाजारों से अलग है। चीन पूरी तरह बैटरी आधारित इलेक्ट्रिक वाहनों पर जोर दे रहा है, जबकि यूरोप सख्त नियमों के जरिए पेट्रोल और डीजल वाहनों को धीरे-धीरे बाहर कर रहा है। दूसरी ओर ब्राजील लंबे समय से एथेनॉल आधारित ईंधन का सफल उपयोग कर रहा है। अब भारत उसी दिशा में आगे बढ़ रहा है, लेकिन खास बात यह है कि यहां इलेक्ट्रिक और फ्लेक्स-फ्यूल दोनों तकनीकों को साथ लेकर चलने की रणनीति अपनाई जा रही है।
