• कार खरीदने की सोच बदली, EMI के बाद पेट्रोल-बीमा-सर्विस का भी हिसाब
अब कार खरीदने से पहले ग्राहक पूछ रहा- असली बचत कितनी होगी?
नई दिल्ली। भारतीय कार खरीदार अब सिर्फ यह नहीं पूछ रहा कि ‘कार कितना माइलेज देती है?’ बल्कि वह यह भी देख रहा है कि कार को 4-5 साल चलाने में उसकी जेब से कुल कितना पैसा जाएगा। खरीद कीमत और EMI के साथ अब पेट्रोल या बिजली का खर्च, सर्विस, बीमा, लोन का ब्याज और आगे बेचने पर मिलने वाली कीमत भी खरीदारी के फैसले का हिस्सा बन गई है।
इस बदलाव की सबसे बड़ी वजह बाजार में बढ़े विकल्प हैं। अब ग्राहक के सामने पेट्रोल, डीजल, CNG, हाइब्रिड और इलेक्ट्रिक कारों के विकल्प मौजूद हैं। हर तकनीक में शुरुआती कीमत और बाद में होने वाला खर्च अलग है। ऐसे में ग्राहक सिर्फ शोरूम की कीमत देखकर फैसला नहीं कर रहा, बल्कि पूरी कार की ‘ओनरशिप कॉस्ट’ यानी लंबे समय तक रखने का खर्च जोड़ रहा है। जुलाई में यात्री वाहन रिटेल बिक्री में CNG, हाइब्रिड और इलेक्ट्रिक वाहनों की संयुक्त हिस्सेदारी करीब 41 फीसदी रही। ऑटो इंडस्ट्री के विशेषज्ञों के मुताबिक affordability यानी ‘कार कितनी सस्ती है’ की परिभाषा बदल रही है। खरीद कीमत और EMI आज भी महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इसके साथ ईंधन, बीमा, मेंटेनेंस और रीसेल वैल्यू भी कुल खर्च तय करते हैं।
CNG कार खरीदने के लिए ग्राहक को पेट्रोल मॉडल की तुलना में शुरुआत में कुछ ज्यादा पैसा देना पड़ सकता है। लेकिन रोजाना ज्यादा किलोमीटर चलाने वालों के लिए CNG का कम रनिंग कॉस्ट इस अतिरिक्त खर्च की भरपाई कर सकता है। 25 मास-मार्केट मॉडल के पेट्रोल और CNG वेरिएंट की एक स्टडी में दोनों के शुरुआती औसत रिटेल दाम में करीब 1.08 लाख रुपये का मीडियन अंतर पाया गया।
हाइब्रिड कारों की शुरुआती कीमत आम तौर पर ज्यादा होती है, लेकिन इनमें पेट्रोल की खपत कम हो सकती है। इसलिए ग्राहक अब सिर्फ यह नहीं देखता कि हाइब्रिड कार कितनी महंगी है, बल्कि यह भी जोड़ता है कि लंबे समय में ईंधन पर कितनी बचत होगी।
EV खरीदते समय ग्राहक बिजली की लागत, चार्जिंग की सुविधा, सर्विस, बैटरी से जुड़ी चिंता और भविष्य की रीसेल वैल्यू जैसे पहलुओं पर भी विचार कर रहा है। कार खरीदने में ग्राहक की जगह और इस्तेमाल भी बड़ी भूमिका निभा रहा है। ग्रामीण इलाकों में गाड़ी की शुरुआती कीमत और रोजाना चलने का खर्च अभी भी सबसे अहम माना जाता है।
