EV की अगली बड़ी छलांग: पुरानी बैटरियों से बनेगा भारत का ‘ग्रीन खजाना’

EV की अगली बड़ी छलांग: पुरानी बैटरियों से बनेगा भारत का ‘ग्रीन खजाना’

नई दिल्ली। इंडिया में सड़कों पर इलेक्ट्रिक कारों, स्कूटर और बसों की संख्या तेजी से बढ़ रही है, लेकिन जब इन वाहनों की बैटरियों की उम्र पूरी हो जाएगी, तब उनका क्या होगा? यहीं से शुरू होती है सर्कुलर इकोनॉमी की कहानी। जब किसी चीज को इस्तेमाल करने के बाद उसे बेकार समझकर फेंका न जाए, बल्कि उसे दोबारा इस्तेमाल किया जाए, उसकी मरम्मत की जाए या उससे नई चीज बनाई जाए। जैसे घर में पुरानी बोतल को फेंकने की जगह दोबारा इस्तेमाल कर लिया जाता है, वैसे ही EV की पुरानी बैटरी से दोबारा उपयोगी सामग्री निकाली जाएगी और नई बैटरी बनाने में लगाई जाएगी।

भविष्य में EV बैटरी का सफर गाड़ी से शुरू होकर रीसाइक्लिंग सेंटर तक जाएगा और फिर नई बैटरी के रूप में वापस लौटेगा। भारत में पैसेंजर व्हीकल सेगमेंट में EV की हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है। आने वाले वर्षों में जब लाखों इलेक्ट्रिक वाहन अपनी बैटरी लाइफ पूरी करेंगे, तब बड़ी मात्रा में पुरानी बैटरियां उपलब्ध होंगी। अगर इन बैटरियों को सही तरीके से संभाला नहीं गया तो पर्यावरण को नुकसान हो सकता है। लेकिन अगर इन्हें सही तकनीक से रीसाइकिल किया जाए तो यही बैटरियां भारत के लिए बहुमूल्य संसाधन बन सकती हैं।

नीति आयोग के अनुमान के मुताबिक, भारत में रीसाइक्लिंग के लिए उपलब्ध पुरानी लिथियम-आयन बैटरियों की मात्रा 2035 तक कई गुना बढ़ जाएगी। EV बैटरियों में लिथियम, निकेल और कोबाल्ट जैसी महंगी और महत्वपूर्ण धातुएं होती हैं। अभी भारत इन खनिजों के लिए काफी हद तक दूसरे देशों पर निर्भर है। लेकिन आने वाले समय में पुरानी बैटरियां ही इन धातुओं का बड़ा स्रोत बन सकती हैं। इससे भारत की आयात पर निर्भरता कम होगी और देश में बैटरी निर्माण को नई ताकत मिलेगी।

टाटा मोटर्स, महिंद्रा, हुंडई और विनफास्ट जैसी कंपनियां रिसाइकिल सामग्री, बैटरी मैनेजमेंट और टिकाऊ निर्माण पर जोर दे रही हैं। महिंद्रा अपनी इलेक्ट्रिक गाड़ियों में PET जैसी रिसाइकिल सामग्री का इस्तेमाल कर रही है, जबकि टाटा मोटर्स भी अपने EV मॉडल में पर्यावरण के अनुकूल सामग्री को बढ़ावा दे रही हैअगर भारत मजबूत बैटरी रीसाइक्लिंग नेटवर्क तैयार कर लेता है तो इसका फायदा सिर्फ EV इंडस्ट्री को ही नहीं, बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था को मिलेगा। पुरानी बैटरियों से लिथियम, निकेल और कोबाल्ट जैसे महत्वपूर्ण खनिजों को दोबारा हासिल किया जा सकेगा, जिससे नई बैटरी बनाने की लागत कम होगी। इस पूरे नए इकोसिस्टम से रिसर्च, मैन्युफैक्चरिंग, सर्विस और रीसाइक्लिंग सेक्टर में हजारों नए रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे। आने वाले समय में पुरानी EV बैटरियां कचरा नहीं होंगी, बल्कि भारत की नई ऊर्जा अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा खजाना बन सकती हैं।