नई दिल्ली: बढ़ती ईंधन कीमतों ने देश के लॉजिस्टिक्स सेक्टर की रफ्तार पर ब्रेक लगा दिया है। हालात ऐसे बन गए हैं कि भारत के करीब 20 प्रतिशत ट्रक सड़कों से बाहर हो गए हैं, जिससे माल ढुलाई प्रभावित होने लगी है। डीजल की कमी, पेट्रोल पंपों पर लंबी कतारें, 11 दिनों में ईंधन कीमतों में ₹7.5–8 प्रति लीटर की बढ़ोतरी और बढ़ते परिचालन खर्च ने ट्रांसपोर्ट इंडस्ट्री पर दबाव बढ़ा दिया है। सबसे ज्यादा असर छोटे ट्रांसपोर्टरों पर पड़ा है, जो देश के 70 प्रतिशत से ज्यादा ट्रक ऑपरेशन संभालते हैं। मालभाड़ा दरों में 10-15 प्रतिशत तक उछाल देखने को मिल रहा है, जिससे खाद्य पदार्थों और अन्य जरूरी सामानों की कीमतों पर भी असर पड़ने की आशंका बढ़ गई है। डीजल की कमी के कारण देश के करीब 95 लाख ट्रकों के बेड़े में से लगभग पांचवां हिस्सा प्रभावित हुआ है।
डीजल संकट का सबसे ज्यादा असर छोटे ट्रक ऑपरेटरों पर पड़ा है, जो देश के ट्रांसपोर्ट सेक्टर का 70 प्रतिशत से अधिक हिस्सा संभालते हैं। बढ़ती ईंधन कीमतों और घटती कमाई के कारण उनकी परिचालन लागत तेजी से बढ़ रही है, जिससे कारोबार चलाना मुश्किल होता जा रहा है।स्थिति तब और गंभीर हो गई जब सरकारी तेल विपणन कंपनियों ने सिर्फ 11 दिनों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में चार बार बढ़ोतरी कर दी। ईरान युद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आने से पेट्रोल और डीजल कुल मिलाकर 8 रुपये प्रति लीटर तक महंगे हो चुके हैं।
राष्ट्रीय राजमार्गों पर कई जगह ट्रकों की लंबी कतारें देखी जा रही हैं। उद्योग से जुड़े अधिकारियों के अनुसार, इसके पीछे एक बड़ा कारण बल्क डीजल खरीदार हैं। पहले ये ग्राहक संस्थागत दरों पर डीजल लेते थे, लेकिन अब संस्थागत और रिटेल कीमतों के बीच 40-42 प्रति लीटर के बड़े अंतर के चलते वे भी पेट्रोल पंपों से डीजल खरीद रहे हैं। इससे रिटेल आउटलेट्स पर दबाव बढ़ गया है और सप्लाई प्रभावित हो रही है।
कार ले जाने वाले ट्रांसपोर्टर (Car Carrier Operators) पहले कई पेट्रोल पंपों से उधार पर डीजल ले लेते थे और बाद में भुगतान कर देते थे। इससे उन्हें रोजमर्रा के खर्च संभालने में मदद मिलती थी। लेकिन अब कई पेट्रोल पंपों ने उधार पर डीजल देना बंद कर दिया है और पहले पैसे जमा कराने के बाद ही ईंधन दिया जा रहा है।
