नई दिल्ली: इंडिया में 1 अप्रैल 2027 से लागू होने वाले CAFE-III (Corporate Average Fuel Efficiency) नियम देश के ऑटोमोबाइल सेक्टर की तस्वीर बदल सकते हैं। रेटिंग एजेंसी ICRA की रिपोर्ट के अनुसार, इन नए नियमों से FY2028 से FY2032 के बीच करीब 38,000 करोड़ रुपये के ईंधन की बचत हो सकती है। इससे न सिर्फ वाहन अधिक ईंधन-कुशल बनेंगे, बल्कि इलेक्ट्रिक (EV) और हाइब्रिड कारों को भी बड़ा बढ़ावा मिलेगा।
ऊर्जा मंत्रालय के मसौदा प्रस्ताव के मुताबिक, यात्री वाहनों के औसत CO₂ उत्सर्जन की सीमा को चरणबद्ध तरीके से सख्त किया जाएगा। यह सीमा FY2028 में 94.8 ग्राम प्रति किलोमीटर और FY2032 तक 78.9 ग्राम प्रति किलोमीटर रह जाएगी। FY2027 की तुलना में 2028 तक लगभग 16% और 2032 तक करीब 30% उत्सर्जन घटाने का लक्ष्य रखा गया है। ICRA का कहना है कि केवल पारंपरिक पेट्रोल और डीजल (ICE) इंजनों में मामूली सुधार करके इन लक्ष्यों को हासिल करना मुश्किल होगा। इसलिए वाहन कंपनियों को इंजन को छोटा और अधिक दक्ष बनाना, गाड़ियों का वजन कम करना, एयरोडायनामिक्स सुधारना, हाइब्रिड तकनीक अपनाना और इलेक्ट्रिक वाहनों की हिस्सेदारी बढ़ानी होगी।
नई व्यवस्था में कंपनियों को नियमों का पालन करने के लिए क्रेडिट जनरेशन, क्रेडिट ट्रेडिंग और फ्लीट पूलिंग जैसी सुविधाएं भी मिलेंगी। खास बात यह है कि इलेक्ट्रिक और मजबूत हाइब्रिड वाहनों को ‘सुपर-क्रेडिट’ का लाभ मिलेगा। इससे EV बनाने वाली कंपनियां अतिरिक्त क्रेडिट अर्जित कर सकेंगी और जरूरत पड़ने पर उन्हें दूसरी कंपनियों को बेच भी सकेंगी। रिपोर्ट के मुताबिक, शुरुआती दौर में कंपनियां कम लागत वाले उपाय अपनाएंगी। इनमें लो रोलिंग रेजिस्टेंस टायर, LED लाइटिंग, टायर प्रेशर मॉनिटरिंग सिस्टम (TPMS) और स्टार्ट-स्टॉप तकनीक शामिल हैं। बाद में जरूरत पड़ने पर माइल्ड-हाइब्रिड सिस्टम और उन्नत ट्रांसमिशन जैसी महंगी तकनीकों का सहारा लिया जाएगा।
ICRA का मानना है कि जिन वाहन कंपनियों का कारोबार अभी भी मुख्य रूप से पेट्रोल-डीजल मॉडलों पर आधारित है, उनके लिए CAFE-III का पालन करना सबसे चुनौतीपूर्ण होगा। वहीं, इलेक्ट्रिक वाहनों पर ज्यादा फोकस करने वाली कंपनियों को सबसे अधिक फायदा मिलने की संभावना है। विशेषज्ञों का कहना है कि CAFE-III नियम भारत को कम ईंधन खपत, कम कार्बन उत्सर्जन और स्वच्छ परिवहन की दिशा में तेजी से आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाएंगे। इससे ग्राहकों को भविष्य में अधिक ईंधन-कुशल और पर्यावरण के अनुकूल वाहन मिलने की संभावना भी बढ़ेगी।
