नई दिल्ली। इंडिया का एथेनॉल उत्पादन पिछले 12 वर्षों में करीब पांच गुना बढ़ गया है। 2013-14 में जहां देश की उत्पादन क्षमता 421 करोड़ लीटर थी, वहीं 2026 में यह बढ़कर लगभग 2,000 करोड़ लीटर हो गई है। सरकार का कहना है कि इससे देश का तेल आयात कम हुआ है, विदेशी मुद्रा की बड़ी बचत हुई है और किसानों को भी फायदा मिला है।
GEMA एथेनॉल कॉन्क्लेव 2026 में खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग के संयुक्त सचिव अश्विनी श्रीवास्तव ने बताया कि 2014-15 से मई 2026 तक पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने (Ethanol Blending Programme) से 310 लाख मीट्रिक टन से अधिक कच्चे तेल के आयात की जरूरत नहीं पड़ी, जिससे करीब ₹1.90 लाख करोड़ की विदेशी मुद्रा बची। सरकार के अनुसार, इस योजना से 930 लाख मीट्रिक टन कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) के उत्सर्जन में भी कमी आई है। साथ ही गन्ना किसानों को समय पर भुगतान मिला और कृषि उपज के लिए नया बाजार तैयार हुआ।
सरकार ने हाल ही में सार्वजनिक वितरण प्रणाली के चावल के गुणवत्ता नियमों में बदलाव किया है। अब पीडीएस के चावल में टूटे चावल (ब्रोकन राइस) की सीमा 25% से घटाकर 10% कर दी गई है। इससे मिलों में अधिक टूटा चावल अलग होगा, जिसका इस्तेमाल एथेनॉल बनाने में किया जा सकेगा। सरकार ने यह भी बताया कि अब मक्का (कॉर्न) एथेनॉल उत्पादन का सबसे बड़ा स्रोत बन गया है। 2024-25 में तेल कंपनियों को सप्लाई किए गए एथेनॉल में करीब 47% हिस्सा मक्के से बना एथेनॉल का था। आगे सरकार E85 ईंधन और फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों को बढ़ावा देने की तैयारी कर रही है। इससे एथेनॉल की खपत और बढ़ेगी, कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम होगी और किसानों की आय बढ़ाने में भी मदद मिलेगी।
