नई दिल्ली: इंडियन इकोनॉमी में हाइवे और ट्रक नेटवर्क की भूमिका बेहद अहम है। देश में करीब दो-तिहाई माल ढुलाई सड़कों के जरिए होती है। हाइवे किनारे ट्रकों की अवैध पार्किंग, ड्राइवरों की थकान, आराम की सुविधाओं की कमी, खराब निगरानी व्यवस्था और कमजोर नियम पालन ने पूरे लॉजिस्टिक्स सिस्टम की कमियां उजागर कर दी हैं। हाल ही में फलोदी सड़क हादसे के बाद सुप्रीम कोर्ट ने हाईवे किनारे खड़े ट्रकों और सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाए। राजस्थान के फलोदी में नवंबर 2025 में हुए हादसे में तीर्थयात्रियों से भरा एक टेंपो ट्रैवलर सड़क किनारे खड़े एक ट्रेलर ट्रक से टकरा गया था, जिसमें 15 लोगों की मौत हो गई थी।
विशेषज्ञों के अनुसार भारत में कमर्शियल वाहनों में AIS-140 जैसे नियम लागू हैं, जिनमें GPS ट्रैकिंग, इमरजेंसी बटन और रियल-टाइम डेटा कनेक्टिविटी जरूरी है, लेकिन जमीन पर स्थिति अलग है। भारत में लगभग 1 करोड़ ट्रक हैं, लेकिन स्मार्ट टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल अभी सीमित है।
इंडिया में अभी ड्राइवरों के काम के घंटों की सख्त निगरानी नहीं होती, इलेक्ट्रॉनिक लॉगिंग सिस्टम अनिवार्य नहीं है, हाईवे किनारे खड़े वाहनों पर ऑटो अलर्ट नहीं आता और ADAS जैसी एडवांस सुरक्षा तकनीक भी बहुत कम ट्रकों में है। थकान के कारण रुकना, खराब रखरखाव से ब्रेकडाउन और रास्ते में अनियोजित रुकावटें जैसी कई समस्याओं का समाधान तकनीक से हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इलेक्ट्रिक ट्रक भी स्थिति सुधार सकते हैं। सरकार ने हाइवे पर ट्रक बे, बस शेल्टर और वे-साइड सुविधाओं के लिए नियम बनाए हैं, लेकिन कई जगह ये या तो बने नहीं हैं या चालू नहीं हैं। जहां बने भी हैं, वहां सुविधाएं अधूरी हैं या कीमतें ड्राइवरों के लिए महंगी हैं।
सरकार की योजना देशभर में आधुनिक वे-साइड अमेनिटी स्टेशन विकसित करने की है। अप्रैल 2025 तक 501 स्टेशन मंजूर हुए थे लेकिन इनमें सिर्फ 94 चालू हो पाए। विशेषज्ञों का कहना है कि देश के करीब 1.46 लाख किलोमीटर हाइवे नेटवर्क को देखते हुए भारत को लगभग 3000 ऐसे केंद्रों की जरूरत होगी। इन केंद्रों में भोजन, आरामगृह, मेडिकल सुविधा, सुरक्षित पार्किंग और EV चार्जिंग जैसी सेवाएं होंगी। रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय ट्रक औसतन रोज सिर्फ 250-300 किमी चलते हैं, जबकि ग्लोबल लेवल पर यह आंकड़ा 500-800 किमी तक है।
