बिक्री में बूम, फिर भी कारोबार का गणित कमजोर
14 लाख बिक्री के बाद भी घाटे में EV इंडस्ट्री
स्कूटर इलेक्ट्रिक, लेकिन बैलेंस शीट अब भी लाल
भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों का बाजार तेजी से बढ़ रहा है। खासकर इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर (e2W) सेगमेंट ने देश की EV क्रांति को नई पहचान दी है। वित्त वर्ष 2025-26 में 14 लाख से ज्यादा इलेक्ट्रिक स्कूटर और बाइक बिके, जो किसी भी अन्य EV श्रेणी से कहीं अधिक हैं। लेकिन हैरानी की बात यह है कि बिक्री के नए रिकॉर्ड बनाने के बावजूद अधिकांश कंपनियां अब भी मुनाफा कमाने से काफी दूर हैं।
उद्योग विशेषज्ञों के अनुसार, समस्या मांग की कमी नहीं बल्कि लागत का गणित है। इलेक्ट्रिक स्कूटरों की सबसे बड़ी लागत बैटरी होती है, जो कुल वाहन कीमत का लगभग 40 से 50 प्रतिशत हिस्सा बनाती है। भारत में बैटरी सेल का अधिकांश हिस्सा अभी भी विदेशों से आयात किया जाता है। कंट्रोलर, सेमीकंडक्टर, पावर इलेक्ट्रॉनिक्स और मोटर के कई महत्वपूर्ण पार्ट्स भी आयात पर निर्भर हैं। आयातित पुर्जों के कारण कंपनियों को डॉलर विनिमय दर, कस्टम ड्यूटी और लॉजिस्टिक लागत का अतिरिक्त बोझ उठाना पड़ता है। यही वजह है कि बिक्री बढ़ने के बावजूद कंपनियों का मार्जिन दबाव में बना हुआ है।
दूसरी बड़ी चुनौती उत्पादन का पैमाना है। भारत में इलेक्ट्रिक स्कूटरों की बिक्री तेजी से बढ़ रही है, लेकिन यह अभी भी पेट्रोल दोपहिया वाहनों की तुलना में काफी कम है। ऐसे में रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D), सॉफ्टवेयर, फैक्ट्री और इंजीनियरिंग पर होने वाला भारी निवेश कम यूनिट्स पर बंटता है, जिससे प्रति वाहन लागत बढ़ जाती है। नई EV कंपनियों के सामने एक और बड़ी चुनौती है। उन्हें शोरूम, सर्विस सेंटर और ग्राहक नेटवर्क शून्य से तैयार करना पड़ रहा है। इसके लिए भारी निवेश करना पड़ता है, जिससे लाभप्रदता और दूर चली जाती है।
हालांकि तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। Bajaj Auto ने दावा किया है कि उसका Chetak इलेक्ट्रिक स्कूटर अब EBITDA स्तर पर घाटे से बाहर आ चुका है। यह संकेत है कि जैसे-जैसे उत्पादन बढ़ेगा और तकनीक पर पकड़ मजबूत होगी, कंपनियों की आर्थिक स्थिति सुधर सकती है।
Ola Electric, Ather, Matter और अन्य कंपनियां भी स्थानीयकरण बढ़ाने पर जोर दे रही हैं। सरकार की PLI योजनाएं और बैटरी निर्माण को बढ़ावा देने वाली नीतियां इस दिशा में मददगार साबित हो सकती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि EV उद्योग का अगला बड़ा चरण “बिक्री की रफ्तार” नहीं बल्कि “मुनाफे की रफ्तार” होगा। जिस कंपनी के पास अपनी तकनीक, मजबूत सप्लाई चेन और अधिक स्थानीय उत्पादन होगा, वही भविष्य की दौड़ में सबसे आगे निकलेगी।
