• अब Made in India ही नहीं, Brand India भी! अपना Apple-Samsung बनाने की तैयारी
• PLI के बाद MPMS की एंट्री, मोबाइल असेंबली से टेक्नोलॉजी किंग बनने की तैयारी
फोन बनाने में नंबर-2 भारत अब बनाएगा अपना ब्रांड, 2027 पर टिकी नजर
भारत में मोबाइल क्रांति 2.0 शुरू, अब दुनिया खरीदेगी ‘Indian Brand’!
नई दिल्ली। भारत में मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग की कहानी अब एक बड़े मोड़ पर पहुंच गई है। 2020 में शुरू हुई प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) योजना ने देश को दुनिया के बड़े मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट हब में खड़ा कर दिया। अब सरकार का लक्ष्य सिर्फ विदेशी कंपनियों के फोन असेंबल करना नहीं, बल्कि भारतीय डिजाइन, रिसर्च, टेक्नोलॉजी और ब्रांड वाले स्मार्टफोन तैयार करना है। इसके लिए 62,500 करोड़ रुपये की Mobile Phone Manufacturing Scheme (MPMS) शुरू की गई है।
सरकार को उम्मीद है कि यह योजना भारत को अगले स्तर पर ले जाएगी। इलेक्ट्रॉनिक्स मंत्री अश्विनी वैष्णव के मुताबिक, 2027 के मध्य तक भारत अपना मजबूत स्वदेशी मोबाइल ब्रांड खड़ा कर सकता है। योजना पांच साल यानी वित्त वर्ष 2030-31 तक चलेगी। इसके तहत कंपनियों को पात्र बिक्री पर 2.25 से 5 फीसदी तक प्रोत्साहन मिलेगा। घरेलू कंपनियों से कंपोनेंट खरीदने और प्रोडक्ट डिजाइन व R&D पर भी अतिरिक्त इंसेंटिव दिया जाएगा।
PLI योजना का असर आंकड़ों में साफ दिखता है। वित्त वर्ष 2025-26 में स्मार्टफोन भारत का सबसे बड़ा व्यक्तिगत निर्यात उत्पाद बन गया। 2014 में स्मार्टफोन देश के शीर्ष 100 निर्यात उत्पादों में भी शामिल नहीं थे।
भारत दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल फोन निर्माता है। देश में इस्तेमाल होने वाले 99.2 फीसदी मोबाइल फोन भारत में ही बनते हैं। मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स की संख्या भी 2014 के सिर्फ दो से बढ़कर 300 से ज्यादा हो गई है। मोबाइल उत्पादन वित्त वर्ष 2019-20 के 2.14 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2024-25 में करीब 5.5 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया। वहीं मोबाइल निर्यात भी तेजी से बढ़ा है।
इस बदलाव में Apple, Samsung, Motorola, Foxconn, Tata और Dixon जैसी कंपनियों की बड़ी भूमिका रही है। PLI से घरेलू निर्माता Dixon जैसे खिलाड़ियों को भी तेजी से बढ़ने का मौका मिला।नई MPMS योजना का फोकस सिर्फ असेंबली पर नहीं है। सरकार चाहती है कि मोबाइल के ज्यादा से ज्यादा कंपोनेंट देश में बनें, कंपनियां खुद डिजाइन और रिसर्च करें और भारतीय बौद्धिक संपदा यानी IP तैयार हो।
विशेषज्ञों का मानना है कि यही अगली बड़ी चुनौती है। भारत ने असेंबली में बड़ी छलांग लगाई है, लेकिन कई अहम कंपोनेंट, तकनीक और सामग्री के लिए अभी भी आयात पर निर्भरता है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत के लिए अपना APPLE फोन बनाना आसान नहीं होगा और इसमें कई साल लग सकते हैं। सिर्फ सरकारी इंसेंटिव से वैश्विक ब्रांड नहीं बनता। इसके लिए बेहतरीन डिजाइन, लगातार इनोवेशन, मजबूत टेक्नोलॉजी, क्वालिटी, मार्केटिंग और ग्राहकों का भरोसा जरूरी होगा।
