PM e-Bus Sewa Scheme  : 10 हजार ई-बसों से बदलेगी 116 शहरों की हवा

PM e-Bus Sewa Scheme  : 10 हजार ई-बसों से बदलेगी 116 शहरों की हवा

• डीजल बसों की होगी छुट्टी, इलेक्ट्रिक बसें बनेंगी भारत की नई पहचान

2070 नेट जीरो लक्ष्य की सबसे मजबूत सवारी बनी इलेक्ट्रिक बसें

सरकार का 20 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का बड़ा दांव

भारत ने वर्ष 2070 तक नेट जीरो कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य तय किया है और इस दिशा में इलेक्ट्रिक बसें सबसे बड़ा बदलाव साबित हो रही हैं। केंद्र सरकार की PM e-Bus Sewa Scheme के तहत 116 शहरों के लिए 10,000 से अधिक इलेक्ट्रिक बसों को मंजूरी दी जा चुकी है। इस योजना पर करीब 2.4 अरब डॉलर (करीब ₹20,000 करोड़) का निवेश किया जा रहा है। इसका मकसद सिर्फ नई बसें खरीदना नहीं, बल्कि शहरों की हवा को साफ करना, डीजल पर निर्भरता घटाना और सार्वजनिक परिवहन को आधुनिक बनाना है।

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार, भारत में सड़क परिवहन से देश के कुल ऊर्जा संबंधी CO₂ उत्सर्जन का करीब 12 प्रतिशत हिस्सा निकलता है। वहीं पर्यावरण मंत्रालय का अनुमान है कि बड़े शहरों में वाहनों से निकलने वाला धुआं PM2.5 प्रदूषण का 20 से 30 प्रतिशत तक जिम्मेदार है। इलेक्ट्रिक बसों के आने से प्रदूषण पूरी तरह खत्म हो जाता है, जिससे हवा साफ होती है और शोर भी कम होता है।

वित्त वर्ष 2025-26 में देश में बिकने वाली कुल बसों में इलेक्ट्रिक बसों की हिस्सेदारी 4.5 प्रतिशत तक पहुंच गई। ई-बसें खरीदने में शुरुआत में डीजल बसों की तुलना में 30 से 50 प्रतिशत महंगी पड़ती हैं, लेकिन लंबे समय में इनका संचालन काफी सस्ता साबित होता है।

श में अधिकांश इलेक्ट्रिक बसें ग्रॉस कॉस्ट कॉन्ट्रैक्ट (GCC) मॉडल के तहत चलाई जा रही हैं। इसमें निजी कंपनियां बसें खरीदती और उनका रखरखाव करती हैं।अनुमान है कि 90 प्रतिशत से अधिक ई-बसें इसी मॉडल पर संचालित हो रही हैं।

राजधानी दिल्ली इस बदलाव की सबसे बड़ी मिसाल बन चुकी है। वर्ष 2025 तक यहां 4,000 से अधिक इलेक्ट्रिक बसें सड़कों पर उतर चुकी थीं। विशेषज्ञों का मानना है कि PM e-Bus Sewa Scheme के तहत चलने वाली 10,000 इलेक्ट्रिक बसें अपने पूरे जीवनकाल में लाखों टन कार्बन उत्सर्जन कम करेंगी। साथ ही शहरी प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण और ईंधन आयात पर निर्भरता भी घटेगी। भारत में इलेक्ट्रिक बसें अब केवल प्रयोग नहीं, बल्कि सार्वजनिक परिवहन का भविष्य बन चुकी हैं। अगर यही रफ्तार बनी रही तो आने वाले वर्षों में देश के शहर न सिर्फ ज्यादा स्वच्छ होंगे, बल्कि 2070 के नेट जीरो लक्ष्य तक पहुंचने की दिशा में भी यह सबसे बड़ा कदम साबित होगा।