सड़क सुरक्षा में क्रांति लाने वाली नई तकनीक पर टेलीकॉम और ऑटो सेक्टर आमने-सामने, नियमों पर नहीं बन रही सहमति
भारत में सड़क दुर्घटनाओं को कम करने के लिए प्रस्तावित व्हीकल-टू-एवरीथिंग (V2X) तकनीक को लागू करने की योजना फिलहाल विवादों में फंस गई है। टेलीकॉम कंपनियों, टेक्नोलॉजी संगठनों और ऑटोमोबाइल उद्योग के बीच अधिकार और नियंत्रण को लेकर मतभेद बढ़ गए हैं, जिससे इस महत्वपूर्ण परियोजना की राह मुश्किल हो गई है। V2X ऐसी तकनीक है जिसमें गाड़ी, ट्रैफिक सिग्नल, सड़क पर लगे सेंसर और दूसरे वाहन आपस में बात कर सकते हैं। अगर आगे अचानक ब्रेक लगे या कोई दुर्घटना हो, तो पीछे वाली गाड़ी को तुरंत चेतावनी मिल सके।
V2X तकनीक में वाहन और सड़क पर मौजूद स्मार्ट सिस्टम आपस में लगातार जानकारी साझा करते रहते हैं। अगर आगे कोई वाहन अचानक ब्रेक लगाता है, तो पीछे आ रही गाड़ियों को तुरंत चेतावनी मिल सकती है। अगर किसी मोड़ पर दुर्घटना हुई है, तो वहां पहुंचने से पहले ही ड्राइवर को अलर्ट मिल सकता है। एंबुलेंस आने पर ट्रैफिक सिग्नल अपने-आप हरा हो सकता है, जिससे उसे रास्ता जल्दी मिले। ट्रैफिक जाम की जानकारी वाहनों को पहले से मिल सकती है, जिससे वे दूसरा रास्ता चुन सकें।
टेलीकॉम कंपनियां चाहती हैं कि V2X के लिए अलग लाइसेंस न बने। सारा V2X डेटा 4G/5G नेटवर्क से चले। कारों और ट्रैफिक सिस्टम के बीच होने वाला संचार मोबाइल कंपनियों के नेटवर्क के जरिए हो।टेक और ऑटो कंपनियों की मांग है कि V2X को तेजी से लागू किया जा सके हर चीज मोबाइल नेटवर्क पर निर्भर न हो। स्मार्ट ट्रैफिक लाइट सीधे पास की कारों को चेतावनी भेज सके, चाहे मोबाइल नेटवर्क कमजोर हो या उपलब्ध न हो।
टेलीकॉम कंपनियां कहती हैं कि V2X के लिए जो स्पेक्ट्रम दिया जाएगा, उसे नीलामी (Auction) के जरिए बेचा जाए। नीलामी से यह स्पष्ट रहेगा कि स्पेक्ट्रम का मालिक कौन है।
टेक और ऑटो कंपनियों का मानना है कि V2X कोई कमाई करने वाली सेवा नहीं, बल्कि जन सुरक्षा (Public Safety) की तकनीक है। इसका मकसद लोगों की जान बचाना है, पैसा कमाना नहीं। अगर स्पेक्ट्रम खरीदने में भारी रकम लगेगी तो परियोजनाएं महंगी हो जाएंगी। V2X सिस्टम में गाड़ियों के अंदर विशेष डिवाइस लगाए जाएंगे, जिन्हें ऑन-बोर्ड यूनिट (OBU) कहा जाता है। यही डिवाइस वाहन को ट्रैफिक सिग्नल, सड़क के सेंसर और दूसरी गाड़ियों से जोड़ते हैं। सड़क सुरक्षा संगठनों की मांग है कि हर V2X डिवाइस की अनिवार्य जांच और प्रमाणन (Certification) हो। दूसरी ओर कंपनियां कहती हैं कि अगर हर डिवाइस को लंबी सरकारी जांच से गुजरना पड़ेगा तो टेस्टिंग लैब्स पर भारी दबाव पड़ेगा। प्रमाणन में महीनों लग सकते हैं। नई कारों की लॉन्चिंग में देरी होगी। लागत बढ़ जाएगी।
V2X तकनीक पर मुख्य रूप से तीन विवाद है।नेटवर्क कौन चलाएगा?स्पेक्ट्रम कैसे मिलेगा? —और उपकरणों की जांच कितनी सख्त हो?
