कंपनियों को कम टेस्टिंग, कम खर्च और डिजाइन की ज्यादा आजादी देने पर मंथन कर रही सरकार
नई दिल्ली। यात्री कारों से जुड़े कुछ तकनीकी नियमों में ढील देने पर सरकार विचार कर रही है। अगर प्रस्ताव को मंजूरी मिलती है, तो कंपनियों को कार डिजाइन करने में पहले के मुकाबले ज्यादा आजादी मिल सकती है। सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) यात्री कारों के व्हील-हब असेंबली, ब्रेक फ्लूइड, ग्राउंड क्लीयरेंस और एक्सेलरेटर कंट्रोल से जुड़े मौजूदा तकनीकी नियमों में बदलाव पर विचार कर रहा है। इस बदलाव का सबसे बड़ा फायदा कार कंपनियों को मिल सकता है। अभी कार कंपनियों को नई कार या उसके अलग-अलग हिस्सों को सरकारी तय मानकों के मुताबिक कई तरह की जांच और मंजूरी से गुजरना पड़ता है। इस पूरी प्रक्रिया में टेस्टिंग, कागजी कार्रवाई और प्रमाणन पर पैसा खर्च होता है। अगर नियमों में ढील मिलती है, तो कुछ जांच या मंजूरी की जरूरत कम हो सकती है, जिससे कंपनियों का टेस्टिंग और होमोलोगेशन यानी सरकारी मानकों के मुताबिक वाहन को मंजूरी दिलाने का खर्च घट सकता है।
कार के पहिए से लेकर कार की सड़क से ऊंचाई तक, इनसे जुड़े कुछ नियम आसान किए जा सकते हैं।कार के पहिए को उसकी जगह पर मजबूती से जोड़ने वाला हिस्से और कार के नीचे और सड़क के बीच की ऊंचाईके नियम आसान बनाए जा सकते हैं।
इससे कंपनियों को नए मॉडल तैयार करने और उनके डिजाइन में बदलाव करने के लिए ज्यादा लचीलापन मिलेगा। अभी कई तकनीकी जरूरतें तय होने के कारण कंपनियों को कार डिजाइन करते समय इन नियमों का पालन करना पड़ता है। नियमों में ढील मिलने पर इंजीनियर और डिजाइन टीम नए तरीके से कारों को विकसित कर सकती हैं। आने वाले समय में कारों के डिजाइन और इंजीनियरिंग में ज्यादा प्रयोग देखने को मिल सकते हैं।
सरकार की ओर से विचार किए जा रहे प्रस्ताव में कंपनियों की जिम्मेदारी भी बनी रहेगी। अगर किसी कार में बाजार में आने के बाद कोई गंभीर तकनीकी समस्या सामने आती है, तो कंपनी को जरूरी कदम उठाने होंगे। जरूरत पड़ने पर कंपनी को प्रभावित वाहनों को रिकॉल भी करना पड़ सकता है।
मंत्रालय और ऑटो इंडस्ट्री के प्रतिनिधियों के बीच कुछ महीने पहले इस प्रस्ताव पर चर्चा हुई थी। हालांकि, अभी यह प्रस्ताव विचार के स्तर पर है। किन टेस्ट और सर्टिफिकेशन नियमों को हटाया या आसान किया जाएगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है।
अगर सरकार इस प्रस्ताव को मंजूरी देती है, तो इसका असर भारत में कारों के डिजाइन, डेवलपमेंट और लागत पर देखने को मिल सकता है।
